Jan 27, 2011

मिट गया जब मिटाने वाला

मिट गया जब मिटाने वाला फिर सलाम आया तो क्या आया
दिल की बरबादी के बाद उन का पयाम आया तो क्या आया

छूट गईं नबज़ें उम्मीदें देने वाली हैं जवाब
अब उधर से नामाबर लेके पयाम आया तो क्या आया

आज ही मिलना था ए दिल हसरत-ए-दिलदार में
तू मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या आया

काश अपनी ज़िन्दगी में हम ये मंज़र देखते
अब सर-ए-तुर्बत कोई महशर-खिराम आया तो क्या आया

सांस उखड़ी आस टूटी छा गया जब रंग-ए-यास
नामबार लाया तो क्या ख़त मेरे नाम आया तो क्या

मिल गया वो ख़ाक में जिस दिल में था अरमान-ए-दीद
अब कोई खुर्शीद-वश बाला-इ-बाम आया तो क्या आया

                                                               ----- दिल शाहजहाँपुरी

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है


इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।
एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।
एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।
निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।
                                                       ---- दुष्यंत कुमार 

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
                                                ---- दुष्यंत कुमार 

मेरी कुंठा


मेरी कुंठा
रेशम के कीड़ों सी
ताने-बाने बुनती,
तड़प-तड़पकर
बाहर आने को सिर धुनती,
स्वर से
शब्दों से
भावों से
औ' वीणा से कहती-सुनती,
गर्भवती है
मेरी कुंठा – कुँवारी कुंती!

बाहर आने दूँ
तो लोक-लाज-मर्यादा
भीतर रहने दूँ
तो घुटन, सहन से ज़्यादा,
मेरा यह व्यक्तित्व
                   ---- दुष्यंत कुमार 

कुछ भी बन बस कायर मत बन


कुछ भी बन बस कायर मत बन ।

ठोकर मार पटक मत माथा
तेरी राह रोकते पाहन
कुछ भी बन बस कायर मत बन ।

तेरी रक्षा का न मोल है
पर तेरा मानव अनमोल है
यह मिटता है वह बनता है
अर्पण कर सर्वस्व मनुज को
कर न दुष्ट को आत्म समर्पण
कुछ भी बन बस कायर मत बन ।
                                    ---- दुष्यंत कुमार  

अपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ


अपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ,
तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ ।
ये दरवाज़ा खोलो तो खुलता नहीं है,
इसे तोड़ने का जतन कर रहा हूँ ।
अँधेरे में कुछ ज़िंदगी होम कर दी,
उजाले में अब ये हवन कर रहा हूँ ।
वे संबंध अब तक बहस में टँगे हैं,
जिन्हें रात-दिन स्मरण कर रहा हूँ ।
तुम्हारी थकन ने मुझे तोड़ डाला,
तुम्हें क्या पता क्या सहन कर रहा हूँ ।
मैं अहसास तक भर गया हूँ लबालब,
तेरे आँसुओं को नमन कर रहा हूँ ।
समाआलोचको की दुआ है कि मैं फिर,
सही शाम से आचमन कर रहा हूँ ।
                                       ---- दुष्यंत कुमार  

प्रतीक्षा


परदे हटाकर करीने से
रोशनदान खोलकर
कमरे का फर्नीचर सजाकर
और स्वागत के शब्दों को तोलकर
टक टकी बाँधकर बाहर देखता हूँ
और देखता रहता हूँ मैं।
सड़कों पर धूप चिलचिलाती है
चिड़िया तक दिखायी नही देती
पिघले तारकोल में
हवा तक चिपक जाती है बहती बहती,
किन्तु इस गर्मी के विषय में किसी से
एक शब्द नही कहता हूँ मैं।
सिर्फ़ कल्पनाओं से
सूखी और बंजर ज़मीन को खरोंचता हूँ
जन्म लिया करता है जो ऐसे हालात में
उनके बारे में सोचता हूँ
कितनी अजीब बात है कि आज भी
प्रतीक्षा सहता हूँ। 
                     ---- दुष्यंत कुमार 

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे


मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे
इस बूढे पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगे

हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेडो मत
हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगे

थोडी आँच बची रहने दो थोडा धुँआ निकलने दो
तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आयेंगे

उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती
वे आये तो यहाँ शंख सीपियाँ उठाने आयेंगे

फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम
अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आयेंगे

रह-रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी
आगे और बढे तो शायद दृश्य सुहाने आयेंगे
मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आयेंगे

हम क्यों बोलें इस आँधी में कई घरौंदे टूट गये
इन असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जयेंगे

हम इतिहास नहीं रच पाये इस पीडा में दहते हैं
अब जो धारायें पकडेंगे इसी मुहाने आयेंगे
                                                   ----- दुष्यंत कुमार 

फिर कर लेने दो प्यार प्रिये

अब अंतर में अवसाद नहीं
चापल्य नहीं उन्माद नहीं
सूना-सूना सा जीवन है
कुछ शोक नहीं आल्हाद नहीं

तव स्वागत हित हिलता रहता
अंतरवीणा का तार प्रिये ..

इच्छाएँ मुझको लूट चुकी
आशाएं मुझसे छूट चुकी
सुख की सुन्दर-सुन्दर लड़ियाँ
मेरे हाथों से टूट चुकी

खो बैठा अपने हाथों ही
मैं अपना कोष अपार प्रिये
फिर कर लेने दो प्यार प्रिये

                              ---- दुष्यंत कुमार 

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं आप को धोखा हुआ होगा

यहाँ तक आते आते सूख जाती हैं सभी नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

गज़ब ये है कि अपनी मौत कि आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परेशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुन कर तो लगता है
कि इंसानों के जंगल में कोई हनाका हुआ होगा

कई फ़ाके बिता कर मर गया जो उसके बारे में
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा

यहाँ पर सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
खुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा

चलो अब यादगारों कि अँधेरी कोठरी खोलें
कमज्कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा
                                                           ----- दुष्यंत कुमार  

कहाँ वो तय था चरागाँ हर इक घर के लिए

कहाँ वो तय था चरागाँ हर इक घर के लिए
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए

यहाँ दरख्तों के साए में धुप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए

न हो कमीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस शहर के लिए

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही
कोई हसीं नज़ारा तो है नज़र के लिए

वो मुतमईन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए

जियें तो अपने बगीचे में गुलमोहर के लिए
मरें तो गैर कि गलियों में गुलमोहर के लिए
                                                     ---- दुष्यंत कुमार  

चांदनी छत पे चल रही होगी

चांदनी छत पे चल रही होगी
अब अकेली टहल रही होगी

फ़िर मेरा ज़िक्र आ गया होगा
वो बर्फ सी पिघल गयी होगी

कल का सपना बहुत सुहाना था
ये उदासी न कल रही होगी

सोचता हूँ कि बंद कमरे में
इक शमा सी जल रही होगी

तेरे गहनों सी खनकती थी
बाजरे कि फसल रही होगी

जिन हवाओं ने तुझको दुलराया
उनमें मेरी ग़ज़ल रही होगी
                              ----- दुष्यंत कुमार 

Jan 24, 2011

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है
समन्दरों ही के लहज़े में बात करता है

खुली छतों के दीये कब के बुझ गए होते
कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है

शराफतों कि यहाँ कोई अहेमियत ही नहीं
किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है

ज़मीं की कैसी विक़ालत हो फ़िर नहीं चलती
जब आसमान से कोई फैसला उतरता है

तुम आ गए हो तो फ़िर कुछ चांदनी से बातें हों
ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है
                                              ----- वसीम बरेलवी 

उसूलों पर जहां आंच आये टकराना जरुरी है

उसूलों पर जहां आंच आये टकराना ज़रूरी है
जो जिन्दा हों तो फ़िर जिंदा नज़र आना ज़रूरी है

नयी उम्रों की खुद-मुख्तारियों को कौन समझाए
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटे
सलीकामंद शाखों ने कहा लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक़ आँखों में तालुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीका ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होठों पे अपनी प्यास रख दो और फ़िर सोचो
कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
                                                          ---- वसीम बरेलवी

मिली हवाओं में उड़ने कि वो सज़ा

मिली हवाओं में उड़ने कि वो सज़ा यारों
कि मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारों

वो बे-ख़याल मुसाफिर मैं रास्ता यारों
कहाँ था बस में मेरे उसको रोकना यारों

मेरे कलम पे ज़माने कि गर्द ऐसी थी
के अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारों

तमाम शहर ही जिसकी तलाश में गुम था
मैं उस के घर का पता किस से पूछता यारों
                                                   ----- वसीम बरेलवी   

मैं चाहता भी यही था वो बेवफा निकले

मैं चाहता भी यही था वो बेवफा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले

किताब-ए-मंजिल का औराक उलट के देख ज़रा
न जाने कौन सा सफ़ाह मुडा हुआ निकले

जो देखने में बहुत ही क़रीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फासला निकले
                                               ----- वसीम बरेलवी

मैं अपने ख्वाब से बिछड़ा नज़र नहीं आता

मैं अपने ख्वाब से बिछड़ा नज़र नहीं आता
तू इस सदी में अकेला नज़र नहीं आता

अजब दबाव है इन बाहरी हवाओं का
घरों का बोझ भी उठता नज़र नहीं आता

मैं इक सदा पे हमेशा को घर छोड़ आया था
मगर पुकारने वाला नज़र नहीं आता

मैं तेरी राह से हटने को हट गया लेकिन
मुझे तो कोई भी रास्ता नज़र नहीं आता

धुंआ भरा है यहाँ सभी कि आँखों में
किसी को घर मेरा जलता नज़र नहीं आता
                                                   ---- वसीम बरेलवी 

लहू न हो तो क़लाम तर्जुमाँ नहीं होता

लहू न हो तो क़लाम तर्जुमाँ नहीं होता
हमारे दौर में आंसू जुबां नहीं होता

जहां रहेगा वहीँ रौशनी लुटायेगा
किसी चिराग का अपना मकां नहीं होता

ये किस मक़ाम पे लायी है मेरी तन्हाई
के मुझ से आज कोई बदगुमां नहीं होता

मैं उस को भूल गया हूँ ये कौन मानेगा
किसी चिराग के बस में धुंआ नहीं होता

'वसीम' सदियों की आँखों से देखिये मुझको
वो लफ्ज़ हूँ जो कभी दास्ताँ नहीं होता
                                              ---- वसीम बरेलवी


अपने हर हर लफ्ज़ का खुद आइना हो जाऊँगा

अपने हर हर लफ्ज़ का खुद आइना हो जाऊँगा
उस को छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा ही नहीं
मैं गिरा तो मसला बन कर खड़ा हो जाऊँगा

मुझको चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो काफ़िला बन जाऊँगा

सारी दुनिया कि नज़र में है मेरा अहेद-ए-वफ़ा
एक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊंगा
                                                    ----- वसीम बरेलवी, 

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
तेरी मर्ज़ी की मुताबिक नज़र आयें कैसे

घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएं कैसे

कह कहा आँख कि बर्ताव बदल देता है
हंसने वाले तुझे आंसू नज़र आयें कैसे

कोई अपनी ही नज़र से तो हमे देखेगा
इक क़तरे को समंदर नज़र आये कैसे
                                              ----- वसीम बरेलवी