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Jan 24, 2011

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है
समन्दरों ही के लहज़े में बात करता है

खुली छतों के दीये कब के बुझ गए होते
कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है

शराफतों कि यहाँ कोई अहेमियत ही नहीं
किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है

ज़मीं की कैसी विक़ालत हो फ़िर नहीं चलती
जब आसमान से कोई फैसला उतरता है

तुम आ गए हो तो फ़िर कुछ चांदनी से बातें हों
ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है
                                              ----- वसीम बरेलवी 

उसूलों पर जहां आंच आये टकराना जरुरी है

उसूलों पर जहां आंच आये टकराना ज़रूरी है
जो जिन्दा हों तो फ़िर जिंदा नज़र आना ज़रूरी है

नयी उम्रों की खुद-मुख्तारियों को कौन समझाए
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटे
सलीकामंद शाखों ने कहा लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक़ आँखों में तालुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीका ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होठों पे अपनी प्यास रख दो और फ़िर सोचो
कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
                                                          ---- वसीम बरेलवी

मिली हवाओं में उड़ने कि वो सज़ा

मिली हवाओं में उड़ने कि वो सज़ा यारों
कि मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारों

वो बे-ख़याल मुसाफिर मैं रास्ता यारों
कहाँ था बस में मेरे उसको रोकना यारों

मेरे कलम पे ज़माने कि गर्द ऐसी थी
के अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारों

तमाम शहर ही जिसकी तलाश में गुम था
मैं उस के घर का पता किस से पूछता यारों
                                                   ----- वसीम बरेलवी   

मैं चाहता भी यही था वो बेवफा निकले

मैं चाहता भी यही था वो बेवफा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले

किताब-ए-मंजिल का औराक उलट के देख ज़रा
न जाने कौन सा सफ़ाह मुडा हुआ निकले

जो देखने में बहुत ही क़रीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फासला निकले
                                               ----- वसीम बरेलवी

मैं अपने ख्वाब से बिछड़ा नज़र नहीं आता

मैं अपने ख्वाब से बिछड़ा नज़र नहीं आता
तू इस सदी में अकेला नज़र नहीं आता

अजब दबाव है इन बाहरी हवाओं का
घरों का बोझ भी उठता नज़र नहीं आता

मैं इक सदा पे हमेशा को घर छोड़ आया था
मगर पुकारने वाला नज़र नहीं आता

मैं तेरी राह से हटने को हट गया लेकिन
मुझे तो कोई भी रास्ता नज़र नहीं आता

धुंआ भरा है यहाँ सभी कि आँखों में
किसी को घर मेरा जलता नज़र नहीं आता
                                                   ---- वसीम बरेलवी 

लहू न हो तो क़लाम तर्जुमाँ नहीं होता

लहू न हो तो क़लाम तर्जुमाँ नहीं होता
हमारे दौर में आंसू जुबां नहीं होता

जहां रहेगा वहीँ रौशनी लुटायेगा
किसी चिराग का अपना मकां नहीं होता

ये किस मक़ाम पे लायी है मेरी तन्हाई
के मुझ से आज कोई बदगुमां नहीं होता

मैं उस को भूल गया हूँ ये कौन मानेगा
किसी चिराग के बस में धुंआ नहीं होता

'वसीम' सदियों की आँखों से देखिये मुझको
वो लफ्ज़ हूँ जो कभी दास्ताँ नहीं होता
                                              ---- वसीम बरेलवी


अपने हर हर लफ्ज़ का खुद आइना हो जाऊँगा

अपने हर हर लफ्ज़ का खुद आइना हो जाऊँगा
उस को छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा ही नहीं
मैं गिरा तो मसला बन कर खड़ा हो जाऊँगा

मुझको चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो काफ़िला बन जाऊँगा

सारी दुनिया कि नज़र में है मेरा अहेद-ए-वफ़ा
एक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊंगा
                                                    ----- वसीम बरेलवी, 

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
तेरी मर्ज़ी की मुताबिक नज़र आयें कैसे

घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएं कैसे

कह कहा आँख कि बर्ताव बदल देता है
हंसने वाले तुझे आंसू नज़र आयें कैसे

कोई अपनी ही नज़र से तो हमे देखेगा
इक क़तरे को समंदर नज़र आये कैसे
                                              ----- वसीम बरेलवी

आते आते मेरा नाम सा रह गया

आते आते मेरा नाम सा रह गया
उन के होठों पे कुछ काँपता रह गया

वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते कि तरह देखता रह गया

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गए
और मैं था कि सच बोलता रह गया

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया
                                         ----- वसीम बरेलवी