Showing posts with label गुलज़ार. Show all posts
Showing posts with label गुलज़ार. Show all posts

Jan 22, 2011

मैं अपने घर में ही अजनबी हो गया हूँ


मैं अपने घर में ही अजनबी हो गया हूँ आ कर
मुझे यहाँ देखकर मेरी रूह डर गई है
सहम के सब आरज़ुएँ कोनों में जा छुपी हैं
लवें बुझा दी हैं अपने चेहरों की, हसरतों ने
कि शौक़ पहचानता ही नहीं
मुरादें दहलीज़ ही पे सर रख के मर गई हैं
मैं किस वतन की तलाश में यूँ चला था घर से
कि अपने घर में भी अजनबी हो गया हूँ आ कर 
                                                        ----- गुलज़ार 

क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं

क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं
नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ
जुनूँ ये मजबूर कर रहा है पलट के देखूँ
ख़ुदी ये कहती है मोड़ मुड़ जा
अगरचे एहसास कह रहा है
खुले दरीचे के पीछे दो आँखें झाँकती हैं
अभी मेरे इंतज़ार में वो भी जागती है
कहीं तो उस के गोशा-ए-दिल में दर्द होगा
उसे ये ज़िद है कि मैं पुकारूँ
मुझे तक़ाज़ा है वो बुला ले
क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं
नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ

                            ----- गुलज़ार 

एक पुराना मौसम लौटा

एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी
ऐसा तो कम ही होता है वो भी हो तन्हाई भी

यादों कि बौछारों से जब पलकें भीगने लगती है
कितनी सौंधी लगती है तब मांजी की रुसवाई भी

दो दो शक्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में
मेरे साथ चला आया है आपका इक सौदाई भी

ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी है
उनकी बात सुनी भी हमने अपनी बात सुनाई भी
                                                         ---- गुलज़ार 

जिंदगी यूँ हुई बसर तनहा

जिंदगी यूँ हुई बसर तनहा
काफिला साथ और सफ़र तनहा

अपने साए से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस क़दर तनहा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे
रात काटे कोई किधर तनहा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती नहीं बसर तनहा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फ़िर न जाने गए किधर तनहा
                                     ---- गुलज़ार  

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त कि शाख से लम्हे नहीं तोड़ा करते

जिसकी आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालो के लिए दिल नहीं थोड़ा करते

लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसी दरिया का कभी रुख नहीं मोड़ा करते
वक़्त कि शाख से लम्हे नहीं तोड़ा करते
                                                 ----- गुलज़ार                                    


इस मोड़ से जाते हैं

इस मोड़ से जाते हैं
कुछ सुस्त क़दम रस्ते
कुछ तेज क़दम राहें

पत्थर कि हवेली को
शीशे के घरौंदों में
तिनकों के नशेमन तक
इस मोड़ से जाते हैं

आंधी कि तरह उड़ कर
इक राह गुज़रती है
शर्माती हुई कोई
क़दमों से उतरती है

इन रेशमी राहों में
इक राह तो वह होगी
तुम तक जो पहुँचती है
इस मोड़ से जाती है

इक दूर से आती है
पास आ के पलटती है
इक राह अकेली सी
रूकती है न चलती है

ये सोच के बैठी हूँ
इक राह तो वह होगी

तुम तक जो पहुँचती है 
इस मोड़ से जाती है 
                       ---- गुलज़ार 









आदतन तुमने कर दिए वादे

आदतन तुमने कर दिए वादे
आदतन हमने ऐतबार किया

तेरी राहों में बारहा रुक कर
हमने अपना ही इंतज़ार किया

अब न मांगेंगे ज़िन्दगी या रब
ये गुनाह हमने इक बार किया
                                      ----- गुलज़ार

नज़्म उलझी हुई है सीने में

नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते फिरते हैं तितलियों कि तरह
लफ्ज़ कागज़ पे बैठे ही नहीं
कब से बैठा हूँ मैं जानम
सादे कागज़ पे लिख के नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इस से बेहतर भी नज़्म क्या होगी
                                       ------ गुलज़ार

शाम से आँख में नमी सी है

शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की  कमी सी है

दफ़्न कर दो हमें कि सांस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है

वक़्त रहता नहीं कहीं छुप कर
इस की आदत भी आदमी सी है

कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है
                                 ----- गुलज़ार

सांस लेना भी कैसी आदत है

सांस लेना भी कैसी आदत है 
जिए जाना भी क्या रवायत है 
कोई आहट नहीं बदन में कहीं 
कोई साया नहीं है आँखों में 
पांव बेहिस हैं, चलते जाते हैं 
इक सफ़र है जो बहता रहता है 
कितने बरसों से, कितनी सदियों से 
जिए जाते हैं, जिए जाते हैं 

आदतें भी अजीब होती हैं 
                              ---- सम्पूरन सिंह "गुलज़ार'